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प्राचीन भारत की समृद्धि में अर्थव्यवस्था का पुनरावलोकन

Author(s): डॉ0 रघुवीर, असिस्टेंट प्रो0, अर्थशास्त्र, बाल गंगा महाविद्यालय सेन्दुल, केभर, टिहरी, गढ़वाल   DOI: 10.70650/rvimj.2026v3i3004   DOI URL: https://doi.org/10.70650/rvimj.2026v3i3004
Published Date: 02-03-2026 Issue: Vol. 3 No. 3 (2026): March 2026 Published Paper PDF: Download

सारांश: प्राचीन भारत की समृद्धि और आर्थिक व्यवस्था का अध्ययन एक महत्वपूर्ण शोध का विषय है, जो भारत के सांस्कृतिक, सामाजिक और आर्थिक इतिहास को समझने में सहायक है। यह शोधपत्र ‘प्राचीन भारत की समृद्धि में अर्थव्यवस्था का पुनरावलोकन‘ शीर्षक के अंतर्गत प्राचीन भारतीय अर्थव्यवस्था के प्रमुख पहलुओं का विश्लेषण करता है। इसमें कृषि, व्यापार, हस्तशिल्प, और विभिन्न आर्थिक प्रथाओं का पुनरावलोकन किया गया है, जिनका उस समय की आर्थिक समृद्धि में विशेष योगदान रहा। प्राचीन भारत की अर्थव्यवस्था मुख्यतः कृषि पर आधारित थी, जिसमें भूमि कर और कृषि उत्पादन का महत्वपूर्ण स्थान था। साथ ही, मौर्य और गुप्त काल के दौरान व्यापार और शिल्पकला ने भी आर्थिक समृद्धि को बढ़ावा दिया। अंतर्राष्ट्रीय व्यापार मार्गों, जैसे कि रेशम मार्ग और समुद्री मार्ग, ने भारत को वैश्विक व्यापार में एक प्रमुख स्थान दिलाया। इस अध्ययन में राज्य की आर्थिक नीतियों, जैसे कि कर संग्रह और वित्तीय संस्थाओं का भी विश्लेषण किया गया है, जो समृद्धि के पीछे की प्रमुख ताकतें थीं। इस शोधपत्र का उद्देश्य प्राचीन भारत की अर्थव्यवस्था के विभिन्न आयामों को स्पष्ट करना है, ताकि हम यह समझ सकें कि कैसे उस समय की आर्थिक संरचना ने न केवल समाज की भौतिक समृद्धि सुनिश्चित की, बल्कि सांस्कृतिक और राजनीतिक स्थिरता में भी योगदान दिया। यह अध्ययन वर्तमान अर्थशास्त्रियों और नीति-निर्माताओं के लिए भी प्रासंगिक है, क्योंकि यह दिखाता है कि प्राचीन नीतियाँ किस प्रकार दीर्घकालीन आर्थिक विकास में सहायक होती हैं।

मुख्य शब्द: प्राचीन भारत, अर्थव्यवस्था, कृषि, व्यापार, मौर्य साम्राज्य, गुप्त काल, रेशम मार्ग, कर व्यवस्था, आर्थिक समृद्धि, वित्तीय संस्थाएँ।.


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