Published Date: 10-01-2026 Issue: Vol. 3 No. 1 (2026): January 2026 Published Paper PDF: Download
सारांश: वर्तमान युग वैज्ञानिक युग है, विज्ञान ने मानव जीवन के प्रत्येक क्षेत्र को प्रभावित किया है। आज मानव विज्ञान के बल पर असीमित शक्ति का स्वामी बन बैठा है, विज्ञान मनुष्य के हाथ में अनुपम शक्ति है। इसके चमत्कारिक आविष्कारों का सहारा लेकर मानव ने बड़ी से बड़ी समस्याओं का समाधान खोज निकाला है। आज असम्भव व काल्पनिक प्रतीत होने वाली सभी बातें सम्भव व हकीकत बन गई है। विज्ञान ने व्यक्ति को पूरी तरह अचम्भित कर दिया है। निज नई चीजों का अविष्कार उसके जीवन-स्तर को ऊँचा उठाने में कोई कसर बाकी नहीं रख रहा है। लगता है जैसे पूरी दुनियाँ हमारे पास सिमट आई है, प्रकृति स्वयं मानव के ऊपर अपने प्राकृतिक खजाने को लुटाने में हर्ष अनुभव कर रही है। हर देश प्रगति के दौड़ में एक दूसरे से आगे निकलने की होड़ में लगा है। इतना सब कुछ होते हुए भी यह संकेत देना तर्क संगत है कि प्रत्येक देश की जनसंख्या तीव्र गति से बढ़ रही है साथ ही ऑधी, तूफान, भूचाल, बाढ़ तथा नित नई बीमारियों ने भी व्यक्ति को अपने शिकंजे में घेर रखा है। विज्ञान के सम्मुख इस प्रकार की समस्याओं की हल करने की एक चुनौती हमेशा सामने खड़ी रहती है। प्रकृति का नियम ही संतुलन है, कुछ देकर, कुछ लेना भी है। इस दृष्टि से विज्ञान ने एक ओर जहाँ हमारे सामने असीमित साधन व सुविधायें उपलब्ध करायी है। वहीं दूसरी ओर उसने हमें असहनीय कष्टों व नित नई बीमारियों से जूझने के लिए अशक्त शक्ति छोड़ दिया है। बडे़-बडे़ बाँध, विद्युत कल कारखाने, आधुनिक वैज्ञानिक सुविधायें और उपलब्धियाँ जहाँ किसी राष्ट्र के विकास के लिए आवश्यक है, वहीं कहीं इससे भी अधिक आवश्यकता है उस मानव का निर्माण करना जो अपनी तुच्छ व दुर्बलताओं से आगे उठने की भावना से सम्पन्न हो और धन लोलुपता एवं स्वार्थपरता की भावना से मुक्त हो, जो समाज व राष्ट्र कल्याण तथा विश्वबन्धुत्व की भावना से युक्त हो, ऐसे मानव की रचना की एक मात्र आधारशिला है, और शिक्षा का उद्गम केन्द्र है- ‘‘शिक्षक’’। शिक्षक ही विद्यालय तथा शिक्षा पद्धति की वास्तविक गत्यात्मक शक्ति है। यह सत्य है कि विद्यालय भवन, पाठ्यक्रम, पाठ्य-सहगामी क्रियायें, शैक्षिक उपकरण आदि महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं, पर जब तक उनमें कुशल-शिक्षकांे द्वारा जीवन शक्ति नहीं प्रदान की जायेगी तब तक वे निरर्थक हैं। शिक्षा की प्रक्रिया में शिक्षक की भूमिका के विषय में कहा जाता है कि शिक्षक राष्ट्र का भाग्य विधाता होता है जो कि प्रत्यक्ष रूप से सत्य प्रतीत होता है क्योंकि शिक्षा का आधार शिक्षक ही है और पाठ्यक्रम को जीवन का अर्थ प्रदान करता है वह शिक्षा प्रणाली की आत्मा के रूप में होता है और समाज में ज्ञान का प्रकाश बिखरेता है। शिक्षक को समाज में महत्वपूर्ण स्थान बनाये रखने के लिए यह आवश्यक है कि वह अपना कार्य सफल ढंग से सम्पादित कर सके। शिक्षकों के विषय में कहा जाता है कि शिक्षक बनाये नहीं जाते हैं अर्थात् जो अध्ययन में मेधावी होते हैं वे अच्छा शिक्षण कार्य कर सकते हैं।