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स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारतीय राष्ट्र-निर्माण की चुनौतियाँ

Author(s): रणधीर कुमार, यूजीसी (राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा), एम.ए. (इतिहास), इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय, नई दिल्ली   DOI: 10.70650/rvimj.2025v2i1000018   DOI URL: https://doi.org/10.70650/rvimj.2025v2i1000018
Published Date: 05-10-2025 Issue: Vol. 2 No. 10 (2025): October 2025 Published Paper PDF: Download

सारांश: स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत के सामने राष्ट्र-निर्माण की प्रक्रिया अत्यंत जटिल और बहुआयामी चुनौतियों से भरी रही। राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक तथा सांस्कृतिक विविधताओं ने राष्ट्रीय एकता और स्थिरता को स्थापित करने में कठिनाइयाँ उत्पन्न कीं। संविधान निर्माण के माध्यम से लोकतांत्रिक ढाँचे की स्थापना की गई, परंतु उसके प्रभावी क्रियान्वयन में अनेक बाधाएँ सामने आईं। राजनीतिक स्थिरता, संस्थागत विकास और कानून व्यवस्था को मजबूत बनाना आवश्यक था। आर्थिक क्षेत्र में औद्योगीकरण की धीमी गति, कृषिगत समस्याएँ, वित्तीय संसाधनों की कमी और असमानता प्रमुख चुनौतियाँ रहीं। सामाजिक स्तर पर जाति, धर्म, भाषा और क्षेत्रीय विविधताओं के कारण समरसता बनाए रखना कठिन था। महिलाओं, पिछड़े वर्गों और अल्पसंख्यकों के सशक्तिकरण की आवश्यकता भी महसूस की गई। इसके साथ ही, आंतरिक सुरक्षा, क्षेत्रीय अस्थिरता और बाह्य संबंधों का संतुलन भी महत्वपूर्ण रहा। विज्ञान एवं तकनीक, शिक्षा और मानव संसाधन विकास ने राष्ट्र-निर्माण में सकारात्मक योगदान दिया, लेकिन डिजिटल विभाजन जैसी नई समस्याएँ भी उभरीं। समग्र रूप से, इन चुनौतियों के समाधान हेतु समावेशी नीतियाँ, सुदृढ़ संस्थाएँ और सामाजिक जागरूकता आवश्यक हैं, जिससे भारत एक स्थिर, समृद्ध और शक्तिशाली राष्ट्र के रूप में विकसित हो सके।

मुख्य शब्द: राष्ट्र-निर्माण, राजनीतिक स्थिरता, आर्थिक विकास, सामाजिक समावेशन, संविधान, विविधता, मानव संसाधन विकास.


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