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स्नातक विद्यार्थियों में संस्थान संतुष्टि का महत्व

Author(s): अमर सिंह सहायक आचार्य, शिक्षा संकाय, राजा हरपाल सिंह महाविद्यालय, सिंगरामऊ, जौनपुर (उ.प्र.) डॉ0 गौरव राव, आचार्य, शिक्षा संकाय, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली   DOI: 10.70650/rvimj.2025v2i11004   DOI URL: https://doi.org/10.70650/rvimj.2025v2i11004
Published Date: 03-11-2025 Issue: Vol. 2 No. 11 (2025): November 2025 Published Paper PDF: Download

Abstract: शिक्षा के किसी भी स्तर के विद्यार्थियों में संस्थान संतुष्टि एक ऐसा सकारात्मक आत्म भाव या अनुभव के समान है जिसके उच्च स्तर से विद्यार्थियों में प्रेरणा का संचार होता है। यह प्रेरणा उनको उस शिक्षण संस्थान से जहाँ वे अध्ययनरत हैं बाहरी एवं आंतरिक दोनों रूप से जोड़े रखने में मदत करती है। इस संतुष्टि का स्तर विद्यार्थियों में जितना अधिक उच्च होगा वे उतना ही अधिक शिक्षण संस्थान की समग्र क्रियाकलापों में भाग लेने के लिए उत्साहित रहेंगे। इससे न केवल अध्यापन और अधिगम स्तर में सुधार की संभावनाओं का मार्ग प्रशस्त होगा बल्कि शिक्षण संस्थान के समग्र क्रियाकलापों को सुचारू रूप से संचालित करने के असीमित मार्ग तलाशे जा सकेंगे। वह इसलिए क्योंकि शिक्षा की सरंचना और संगठन को पुनरीक्षित करने के लिए जो भी नीतियाँ बनायीं जाती हैं एवं सरकारी तंत्र द्वारा जो निर्णय लिए जाते हैं वह शिक्षा के केंद्र बिंदु बालक तथा समाज में उसकी आवश्यकता को ध्यान में रखकर ही लिए जाते हैं। जब समूची शिक्षा का केंद्र बिंदु बालक है तो क्यों न उन शिक्षण संस्थानों जो वर्तमान समय में शिक्षा दीक्षा का कार्य करते हैं उनकों इस तरह से विकसित और संगठित किया जाये कि वे शिक्षण और प्रशिक्षण कार्य के साथ-साथ बालक की पसंद स्तर में उच्चतम स्तर को छुएं। यह पसंद का उच्च स्तर विद्यार्थियों में अपने अध्ययनकाल के दौरान एक खुशनुमा शैक्षिक जीवन का भाव विकसित करेगा जिससे विद्यार्थी उस संस्थान से अच्छी तरह से समायोजित हो सकेंगे और उच्च आकादमिक उपलब्धि को प्राप्त कर सकेंगे। यह संतुष्टि का स्तर न केवल विद्यार्थियों के स्वयं अध्ययन को गति देने में मदतगार साबित होगा बल्कि शिक्षक के अध्यापन कार्य में बालक की अन्तक्रियात्मकता को कैसे बढ़ाया जाये इसके लिए मार्ग तलाशने में सहयोग करेगा। यह संतुष्टि का भाव विद्यार्थियों में शिक्षण संस्थान के भौतिक संसाधनों जैसे आकर्षक भवन और उसमें स्वच्छ पेयजल तथा साफ सुथरे शौंचालयों की व्यवस्था, अच्छी कुर्सियां और बैठने का उचित प्रबंध, हवादार और आधुनिक शिक्षण प्रशिक्षण कक्ष, किसी कक्ष विशेष में विद्यार्थियों की सीमित संख्या और पर्याप्त शिक्षण एवं अध्यापन संसाधन की उपलब्धता, मानक अनुसार शिक्षक संख्या और उनकी विषय समझ, स्वास्थ्य उपचार की व्यवस्था, पुस्तकालय, प्रयोगशाला एवं छात्रावास व्यवस्था आदि अन्य संसाधनों की समुचित व्यवस्था पर तो निर्भर करता ही है साथ ही बहुत से अभौतिक अथवा आंतरिक कारक होते हैं जिनसे विद्यार्थियों की संस्थान संतुष्टि सीधे तरह से प्रभावित होती है। इन आंतरिक कारकों में शिक्षक और विद्यार्थियों एवं विद्यार्थियों और विद्यार्थियों के बीच सकारात्मक सम्बन्ध, शिक्षकों द्वारा विद्यार्थियों पर स्नेहपूर्ण व्यवहार, अवसरों की समानता, अवरोध-मुक्त वातावरण तथा सुरुक्षित भविष्य आदि से है। इन मूलभूत सुविधाओं के अतिरिक्त विद्यार्थियों का स्वयं का प्रत्यक्षण, बुद्धि, सृजनात्मक क्षमता, व्यक्तित्व आदि अभौतिक कारक हैं जो संस्थान संतुष्टि को प्रभावित करते हैं। पूर्व में हुए अनेकों अध्ययनों से यह विदित है कि विद्यार्थियों की बुद्धि (रचना, 2007 पृ.सं. 43), सृजनात्मकता (चौमेडेस, 1996 पृ.सं. 71), सामाजिक आर्थिक स्तर (एनेनी, 2008 पृ.सं54) तथा व्यक्तित्व आदि संस्थान संतुष्टि में एक कारक की भूमिका निभाते हैं। इसकी अपेक्षा अगर विद्यार्थियों में अध्ययनरत शिक्षण संस्थान के प्रति किसी असुविधा का अनुभव महसूस हो रहा है जिससे वे वहां प्रसन्नता और खुले वातावरण, आत्मिक स्वतंत्रता एवं अपने विचारों को बिना रोकटोक के प्रदर्शन नहीं कर पा रहे हैं तो वहां इस बात की अधिक सम्भावना हो सकती है कि विद्यार्थी संस्थान असंतुष्टि का अनुभव महसूस करें। संस्थान असंतुष्टि के कारण इन विद्यार्थियों की न तो शैक्षिक उपलब्धि श्रेष्ठ हो पाती है और न ही यह अपने सामाजिक और आर्थिक जीवन में कोई विशेष सफलता अर्जित कर पाते हैं। सामाजिक जीवन में इसलिए असफल होते रहते हैं क्योंकि आयु के एक बड़े दौर को इन्होंने उन शिक्षण संस्थाओं में बिता दिया जहाँ वे अपनी संस्थान असंतुष्टि के भाव के कारण न तो शिक्षकों से अच्छे पारस्परिक सम्बन्ध बना पाए और न ही अपने सहपाठियों से अच्छे सामाजिक कौशलों को सीख पाए। आज इस बात के चिंतन की बहुत आवश्यकता है कि शिक्षा के किसी भी स्तर की सरंचना और उसके संगठन की आधारशिला को मजबूत तभी किया जा सकता है जब शिक्षण संस्थान में अध्ययनरत विद्यार्थी उसके प्रति संतुष्टि का भाव रखते हों। संस्थान संतुष्टि की भावना उनमें आज्ञाकारिता की ज्योति जलाकर उन्हें अनुशासित बनाने में भी मदत करती है। संस्थान के प्रति संतुष्टि की भावना ही है जो उन्हें प्रतिदिन शिक्षण संस्थान आने के लिए प्रेरित करती है। यह शिक्षकों और विद्यार्थियों के बीच विश्वास की डोर को मजभूत करने में अहम् भूमिका निभाती है। इस प्रकार यह कहने में कोई अतिश्योक्ति नही होगी कि जबतक विद्यार्थियों में संस्थान संतुष्टि की भावना को सकारात्मक दिशा में विकसित नही कर दिया जाता तबतक इन्हें शिक्षण अथवा प्रशिक्षण देना एक कोरी कल्पना होगी। यह कहना इसलिए और उचित हो जाता है क्योंकि जबतक अध्यापन में इन विद्यार्थियों की सहभागिता नही बढ़ेगी तबतक अध्यापन और अधिगम की प्रक्रिया को संचालित कर पाना बहुत मुश्किल कार्य होगा। इस प्रकार यह आवश्यक है की संस्थान संसाधनों तथा विद्यार्थियों के व्यक्तित्व शीलगुणों को धनात्मक दिशा देकर संस्थान सतुष्टि को कायम रखने का प्रयास निरंतर किया जाता रहे।

मुख्य शब्द: संस्थान संतुष्टि, असंतुष्टि, आधारभूत भौतिक संसाधन.


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