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बिहार में मंडलवादी राजनीति और पिछड़ों का उभारः एक विश्लेषणात्मक अध्ययन

Author(s): राकेश रंजन झा, शोधार्थी, राजनीति विज्ञान विभाग, बी. एन. एम. यू., मधेपुरा।.   DOI: 10.70650/rvimj.2025v2i12009   DOI URL: https://doi.org/10.70650/rvimj.2025v2i12009
Published Date: 05-12-2025 Issue: Vol. 2 No. 12 (2025): December 2025 Published Paper PDF: Download

सारांशः: बिहार की राजनीति में मंडल आयोग की सिफारिशों (1990) के कार्यान्वयन ने सामाजिक-राजनीतिक परिदृश्य को पूरी तरह बदल दिया। ऊपरी जातियों के वर्चस्व को चुनौती देते हुए अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) का उदय हुआ, जिसने सामाजिक न्याय, आरक्षण और जातीय गठबंधनों को केंद्र में ला दिया। लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार जैसे नेताओं ने इस उभार को आकार दिया। यह आलेख ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, प्रमुख घटनाओं, प्रभावों और वर्तमान परिदृश्य का विश्लेषण करता है। बिहार का सामाजिक-राजनीतिक इतिहास लंबे समय तक जातिगत संरचनाओं, वर्चस्व, असमानता और संसाधनों के असमान वितरण से प्रभावित रहा है। स्वतंत्रता के शुरुआती दशकों में यहाँ की राजनीति पर ऊँची जातियों विशेषकर भूमिहार ब्राह्मण, राजपूत और कायस्थ का प्रभुत्व था। वहीं पिछड़ी जातियाँ, विशेषकर ‘अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) और अत्यंत पिछड़ा वर्ग (EBC), सामाजिक-शैक्षणिक रूप से वंचित रही थीं। इस पृष्ठभूमि में 1990 के दशक का ‘मंडल दौर’ न केवल बिहार बल्कि उत्तर भारत में एक सामाजिक क्रांति लेकर आया। मंडल आयोग की सिफारिशों के लागू होने से बुनियादी संरचनाओं राजनीति, नौकरशाही, शिक्षा, अर्थव्यवस्था और सामाजिक पहचान में गहरे परिवर्तन उत्पन्न हुए।

मुख्य शब्द: सामाजिक, राजनीतिक, ऐतिहासिक, अर्थव्यवस्था, शिक्षा।


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