मनरेगाः कामगारो की सामाजिक सुरक्षा का एक समाज वैज्ञानिक अघ्ययन
Published Date: 11-08-2025 Issue: Vol. 2 No. 8 (2025): August 2025 Published Paper PDF: Download
सारांश: रोजगार हर मनुष्य के जीवन-संचालन के लिए आवश्यक होता है। अपनी दैनिक आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए हमें अर्जन की आवश्यकता होती है। इसके लिए काम का मिलना जरूरी है। हर आदमी को उसकी क्षमता के अनुसार काम का मिलना ही रोजगार है, जिससे वह अपने जीवन की जरूरतों को पूरा करने में सक्षम होता है। इस प्रकार यह स्पष्ट होता है कि रोजगार के बिना कोई भी मनुष्य अपने अस्तित्व को बचाने में सक्षम नहीं हो सकता। बेरोजगारी एक अभिशाप है। एक बेरोजगार मनुष्य कुत्सित विचारों से घिर जाता है। रोजगार मनुष्य को जीने का अर्थ देता है। उसे एक सचेत नागरिक के रूप में सामाजिक प्रगति के प्रति सचेत करता है। रोजगार प्राप्त व्यक्ति समाज का हितैषी बन जाता है। भारत एक विशाल देश है, जिसकी अधिकांश जनसंख्या गांवों में निवास करती है। अर्थात भारत की आत्मा गांवों में बसती है और इन्हीं गांवों में विभिन्न धर्म, जाति और सम्प्रदाय के लोग मिल-जुलकर रहते हैं। वास्तव में ग्रामीण परिवेश ही भारत की विविधता में एकता को दर्शाता है। गांवों के विकास के बिना देश का विकास अधूरा है। वैसे तो गांवों का महत्व आरम्भ से ही रहा है परन्तु स्वतंत्रता के बाद सरकार गांवों के महत्व को समझने लगी है और उसके विकास पर अधिक ध्यान दिया जाने लगा है। संविधान लागू होने के बाद से ही देशभर में विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों व नगरीय मलिन बस्तियों में बसने वाले वंचितों, गरीबों, दिव्यांगों, महिलाओं, बच्चों और वृद्धों जैसे कमजोर तबकों के लिए नयी-नयी कल्याणकारी योजनाओं और कार्यक्रमों को संचालित कर उन्हें समाज की मुख्यधारा से जोड़ने हेतु विभिन्न प्रयास किये जाते रहे हैं। देशवासियों के सर्वांगीण विकास के उद्देश्य से सरकार द्वारा चलाई गयी विभिन्न रोजगारपरक योजनाओं, कल्याणकारी एवं मूलभूत सुविधाओं को जुटाने की शुरुआत वर्ष 1952-53 में सामुदायिक विकास सेवा कार्यक्रमों का संचालन हो रहा है। इन कार्यक्रमों का मूल उद्देश्य आर्थिक विकास के साथ-साथ सामाजिक न्याय सुनिश्चित करना था।
मुख्य शब्दः मनरेगा, सामाजिक सुरक्षा, रोजगार, बेरोजगारी, सामाजिक न्याय।.