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भारत में दलित महिलाओं के राजनीतिक विकास का एक अध्ययन

Authors: मो0 अफरोज आलम, शोधार्थी, राजनीति विज्ञान विभाग, सामाजिक विज्ञान संकाय, भूपेंद्र नारायण मंडल विश्वविद्यालय, मधेपुरा प्रो० (डॉ०) पवन कुमार, शोध पर्यवेक्षक, प्राचार्य, पी० एस० कॉलेज, मधेपुरा, भूपेंद्र नारायण मंडल विश्वविद्यालय, मधेपुरा   DOI: 10.70650/rvimj.2025v2i800011   DOI URL: https://doi.org/10.70650/rvimj.2025v2i800011
Published Date: 10-08-2025 Issue: Vol. 2 No. 8 (2025): August 2025 Published Paper PDF: Download

सारांश: इस शोध आलेख का शीर्षक “भारत में दलित महिलाओं के राजनीतिक विकास का एक अध्ययन“ है। यह लोकतंत्र, प्रतिनिधित्व और सामाजिक न्याय के बुनियादी सवालों को छूता है। ऐसे देश में जहाँ लोकतांत्रिक सिद्धांत संविधान में निहित हैं। भारत में दलित महिलाओं का राजनीतिक विकास सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृ तिक संघर्षों के बीच विकसित हुआ है। भारतीय समाज की जाति-आधारित संरचना और पितृसत्तात्मक व्यवस्था ने ऐतिहासिक रूप से दलित महिलाओं को दोहरे शोषण का शिकार बनाया। उन्हें न केवल महिला होने के कारण भेदभाव सहना पड़ा, बल्कि दलित होने के कारण सामाजिक बहिष्कार, अपमान और हिंसा का भी सामना करना पड़ा। इस पृष्ठभूमि ने उनकी राजनीतिक चेतना और भागीदारी को लंबे समय तक सीमित रखा। स्वतंत्रता-पूर्व काल में दलित महिलाओं की राजनीतिक भूमिका सीमित थी, किंतु सामाजिक सुधार आंदोलनों ने उनके भीतर चेतना का संचार किया। ज्योतिबा फुले और सावित्रीबाई फुले द्वारा शिक्षा पर दिया गया बल तथा डॉ. भीमराव अंबेडकर के नेतृत्व में चले दलित आंदोलनों ने दलित महिलाओं को अपने अधिकारों के प्रति जागरूक किया। महाड़ सत्याग्रह और अन्य आंदोलनों में दलित महिलाओं की भागीदारी ने उनके राजनीतिक विकास की नींव रखी। स्वतंत्र भारत में भारतीय संविधान ने समानता, स्वतंत्रता और सामाजिक न्याय के सिद्धांतों के माध्यम से दलित महिलाओं के राजनीतिक सशक्तिकरण का मार्ग प्रशस्त किया। अनुसूचित जातियों और महिलाओं के लिए आरक्षण व्यवस्था ने उन्हें संसद, विधानसभा और विशेष रूप से पंचायती राज संस्थाओं में प्रतिनिधित्व प्रदान किया। 73वें संविधान संशोधन के बाद बड़ी संख्या में दलित महिलाएँ स्थानीय स्वशासन संस्थाओं में निर्वाचित हुईं, जिससे उनकी राजनीतिक भागीदारी में उल्लेखनीय वृद्धि हुई। हालाँकि यह प्रतिनिधित्व प्रारंभ में कई स्थानों पर प्रतीकात्मक रहा और वास्तविक सत्ता पुरुषों या प्रभुत्वशाली वर्गों के हाथों में बनी रही, फिर भी शिक्षा, प्रशिक्षण और अनुभव के साथ दलित महिलाओं ने निर्णय-निर्माण की प्रक्रिया में सक्रिय भूमिका निभाना शुरू किया। राज्य और राष्ट्रीय राजनीति में भी कुछ दलित महिलाओं ने नेतृत्व कर यह सिद्ध किया कि वे प्रभावी राजनीतिक भूमिका निभा सकती हैं।

मुख्य शब्द: महाड़ सत्याग्रह, दलित, राजनीतिक, सशक्तिकरण, सामाजिक-संरचना, राजनीतिक विकास, भागीदारी संरचनाओं, सांस्कृतिक।


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